Wednesday, June 11, 2014

गजल-२५१ 

दाबी करैछ सदिखन
काबिल बनैछ सदिखन

मनुखक भरोस नै किछु 
फाजिल बजैछ सदिखन

अजगुत मिजाजकेँ तैँ 
गुमसुम रहैछ सदिखन

संगे रहत किये ओ 
अलगे चलैछ सदिखन 

राजीव धार नै धरि 
सोँझे बहैछ सदिखन 

२२ १२१ २२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

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