Sunday, December 9, 2012


गजल २३ 
कहियो अहि माटि पर पूजल जैत छली नारी
अइयो धरि घर कए सम्हारैत रहली नारी

रहल सभ दिन एक्कहि टा रूप नारी कए यौ
सहल सभ पीर चुप्पे कहियो ने तनली नारी 

कहियो सजाओल जैत छल देह पर गहना
आजुक समाज में मुदा सभ रुपे लूटली नारी

जन्म लेली माटि सए जाहि देश में जनकसुता 
ओहि ठाम कुकृत्यक कारने लाजे गरली नारी

ओइल सधेबाक नव रूप देखबा में आयल
अंग अंग कटवा कए धरा पर खसली नारी

जानकी द्रौपदी अहील्या अनसुईयाक गाम में
नित सभ तरहे कष्टक मारल सीझली नारी

"राजीव"जगाबैथि अहि माटिक माय बहिनकँ 
कहिया धरि सहती सभटा बनि पुतली नारी 

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१८)
राजीव रंजन मिश्र 

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