Monday, June 25, 2012

परमात्मा जौं देने छथि लिखबाक कला 
त अपन लेखनीक ताकत के व्यर्थ नै करी
लेखक आ कविक होइत छैक किछु जिम्मेदारी
ई सोचि किछु लीखी जे शब्द के द्विअर्थ नै करी

जानैत बुझैत सबटा नीक आ बेजा 
नकारात्मक सोच आ चीज़क समर्थ नै करी
खराबक बखान क$ सेहो करेज तानि क$ 
लोक के बुरियाबय के अनर्थ नै करी

एक त ओनाहितो कमी नै थीक कुचालि केर
कुरीति के बढ़ाबय के शर्त नै धरी
लेखनीक ताकत के इतिहास थीक गवाह
हे प्रभु! जौं लीखी त लिखबाक अर्थ नै हरी


----राजीव रंजन मिश्र 
  ३१.०५.२०१२ 
कहलक शराब एक दिन ,बोतल सँ  भ उदास
कहियोऊ कि हम तोरा,कतेक अछि मोन खरास
पीलक त सबतैर  सब,कोनो नै कोनो कारणे
मान हनन क सदिखण,कैलक सतत निराश

क्योऊ जिबय ला पिलक,क्योऊ जील पिबय ला
क्योऊ खुश भ पीलक,क्योऊ  गम मिटबय ला
सुख हो वा दुःख,हम सब संग निष्पक्ष रहलहुं
पिबि ,अपन मोनक क,कैलक हमरा हताश

उचित हो वा अनुचित,हो नीक वा बेजा
रहिकय गवाह सबहक,चुपचाप सबटा सहलहूँ 
सूरा स बिगारि हमरा,चुल्लू बना देलक
ओहदा  घटाबय के कैलक बृहद विन्यास

सब गप्प हमर मोनक,मोनहिं टा में रहि गेल
नै पुछलक,नै बुझलक,सोच सबटा बहि गेल
जौं बश हमर चलित,इन्द्रलोके टा तक रहितहूँ
आनि मुदा घर-घर में ,कैलक हमर विनाश

---राजीव रंजन मिश्र 
२६.०५.२०१२

मोन के मोन सँ जे बुझयति  अछि ,ओ माँ होयत अछि!
तन के भाव सँ जे बुझयति  अछि ,ओ माँ होयत अछि!
धन के आशीर्वाद सँ जे बुझयति  अछि ,ओ माँ होयत अछि!
प्राण के प्राण जे बुझयति  अछि ,ओ माँ होयत अछि!

प्रकृति सँ जे भेंट करावति अछि ,ओ माँ होयत अछि!
जग-समाज सँ जे मेट करावति अछि ,ओ माँ होयत अछि!
प्रभु-प्रसाद सँ जे सहेट  करावति अछि ,ओ माँ होयत अछि!
आर त आर,बाप सँ  जे भेंट करावति अछि ,ओ माँ होयत अछि!

मोन,मोन अछि,कियाक त माँ होयत अछि!
तन,तन अछि,कियाक त माँ होयत अछि!
धन,प्राण अछि,कियाक त माँ होयत अछि!
बंधू! जीवन,जीवन अछि,कियाक त माँ होयत अछि!

कहियो सोचलहूँ जे हम बुझय के,जे माँ की होयत अछि!
बुझि सकलंहू नै अथक चाहि,जे माँ की होयत अछि!
कहियो बैसलंहू जे हम सोचे ला,जे माँ की होयत अछि!
हारि-थाकि मनलहूँ याह टा मोन सँ,जे माँ त बस माँ होयत अछि! 


---राजीव रंजन मिश्र 
१३.०५.२०१२

वो मिटटी की खुशबू,वो ताज़ी हवा,
महक प्यारे फूलों की,चहक पंक्षियों की!
छटा है निराली,मेरे गांव की जो,
वो,भला सारे जग में मिलेगी कहाँ!

किरण उगते सूरज की,नित दिन सबेरे,
ख़ामोशी दोपहर की व डूबते सूरज की वो लालिमा!
तपिश में जो ठंढक है,मेरे गांव की जो,
वो,भला सारे जग में मिलेगी कहाँ!

फसल लहलहाते और हरियाली खेतों की,
मदमस्त हो गाते विरह गीत खेतिहर!
धुन में है सरगम, मेरे गांव की जो,
वो,भला सारे जग में मिलेगी कहाँ!

वो निःशब्द रातें ,वो तारों की झिलमिल,
थके हारे आँखों में,अमन चैन की नींद,
उजाला है चांदनी में,मेरे गांव की जो,
वो,भला सारे जग में मिलेगी कहाँ!

राजीव रंजन मिश्र
२२.०३.२०१२
लहलहाईत खेत आ,
खरिहानक ओ रंगिमा!
ओ मनोरम दृश्य,
आ सूरजक ओ लालिमा!
मोन के लोभा जाईत अछि ,
हमर गामक ओ भंगिमा!!

चारू तरफ खिलखिलाईत,
मदमस्त फूलक ओ छटा!
ताजगी समां के दईत,
मेघक ओ कारी घटा!  
मोन के  दईत अछि रमा,
हमर गामक ओ भंगिमा!!

चिंता स कोसों दूर,
आ प्रपंचक नै कोनो चिन्ह अछि,
शहरक प्रदूषित हवा सँ,
सब तरहे ओ भिन्न अछि!
देह में फुर्ती  दईत अछि जमा,
हमर गामक ओ भंगिमा!!

प्रीतक उताहुल लोक आ,
वात्सल्य हुनक नेह केर!
मोन के करैत अछि विह्वल,
अमोल भेंट हुनक स्नेह केर!
अछि जीवय के सदिखन प्रेरणा,
हमर गामक ओ भंगिमा!!

राजीव रंजन मिश्र 
२२.०३.२०१२
ममता से भरी आँखे,
वह स्नेह भरा स्पर्श!
दुनिया में अपने आप में,
है प्रेम का उत्कर्ष!
खुद भूखे रहकर,
जो बच्चे को खिलाती!
गिले बिस्तर में लेटकर,
जो बच्चे को सुलाती!
रातों को जागकर,
जो लोरी सुनाती!
मत भूलो मेरेदोस्तों,
वो 'माँ' है कहलाती!
सिने में अपने गम लिये,
हर जख्म सह जाते!
बाजू में अपने दम लिये,
जो हर बोझ उठाते!
बच्चों के वास्ते,
जो पसीना है बहाते!
मत भूलो मेरे दोस्तों,
वो है 'बाप' कहलाते!

पर,बच्चे जब बढ़कर,
अपने औकात में आते!
अपने बच्चों के प्रति,
अपना हर फ़र्ज़ निभाते!
पर याद नहीं रह जाती उन्हें,
कि कुछ और भी हैं नाते!
जिनका न कोई मांग है,
और है भी तो सुने नहीं जाते!
निश्छल हो निःस्वार्थ जीने वाले,
माँ-बाप कभी कुछ भी नहीं पाते!
पर,बेफिक्री से जीने वाले,
भला यह क्यों भूल जाते!
कि वही बच्चे बड़े होकर,
हैं निर्ममता की इतिहास दुहराते!


राजीव रंजन मिश्र